Friday, January 2, 2009

नन्ही जान के अंदर एक और जिंदगी

Jan 02, 10:27 pm

वाराणसी [जासं]। उस बच्चे के बारे में जानकर उसके मां-बाप तो हैरान हुए ही, डाक्टरों ने भी दांतों तले उंगली दबा ली। दरअसल, उस नन्हीं सी जान के अंदर एक और जिंदगी आकार ले रही थी। बच्चे के अंदर पल रहे उस अविकसित भ्रूण को निकालने के लिए डाक्टर अब उसके आपरेशन की तैयारी में जुटे हैं।

ढाई माह पहले उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हेमंत कुमार के घर लड़के ने जन्म लिया, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन थोड़े ही दिनों में उनकी यह खुशी काफूर हो गई। समय बीतने के साथ-साथ उनके बच्चे का पेट बढ़ने लगा। पिछले दस दिनों से दुर्गेश ने पिया हुआ दूध भी उल्टी करना शुरू कर दिया, तो परिजनों की घबराहट बढ़ने लगी। स्थानीय स्तर पर इलाज करवाया गया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। तब थक-हार कर हेमंत कुमार अपने बच्चे को लेकर बनारस के बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल चिकित्सालय पहुंचे। जहां जांच में पता चला कि उस बच्चे के पेट में एक और बच्चा पल रहा है। यह बात सुनते ही हेमंत अपने लाडले की जान को लेकर थोड़े सशंकित हुए। घबराहट इतनी बढ़ी कि वह वहीं रोने भी लगे। लेकिन डाक्टरों के ढांढस बंधाने पर उनके चेहरे पर मुस्कान लौटी।

उस बच्चे का इलाज कर रहे डाक्टरों की टीम ने विस्तृत जांच के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया। अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ प्रो. एसएन गंगोपाध्याय ने बताया कि ऐसे केस को 'फीटस इन फिटु' [गर्भ में पल रहे बच्चे के पेट में एक और बच्चा] कहते हैं। यह अधिकतर लड़कियों में ही देखने को मिलते हैं। मेल चाइल्ड [लड़का] के पेट में बच्चा होने की घटना बिरले ही देखने को मिलती है।

Monday, August 18, 2008

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जीवन पथ
- खेतेश्वर शंकरलाल बोरावट

जिस पथ पर जाना ना हो, उस पर पग ही क्यों धरें ?
राह जो मंजिल की है, कितनी भी मुश्किल क्यों डरें ||1||

चलते रहना है हमको, मंजिल जब तक ना मिले |
जीवन चाहे मिट जाये, हौसला फिर भी ना हिले ||2||

हम भटकने वालों में से नहीं, हमें पता अपनी मंजिल |
अब हमारा मन भी यही, यही है हमारा दिल ||3||

चाहे कितने भी हों प्रलोभन, चमक और सुख अनेक |
चलना बस उसी पर है, चुनी है जो राह एक ||4||

क्या हुआ जो सुख ना मिले, ना मिले अपना कोई |
चलना सच्चाई की राह पर, था मेरा सपना यही ||5||

क्यों ना आयें पल पल, कांटे अनेकों सामनें |
सत्य की शक्ति हमेशा, साथ है मुज्ञको थामनें ||6||

मिलेगी जब मंजिल मुज्ञे, वह क्षण कितना अनुपम होगा |
यही सोच कर हर पल, चलना प्रतिक्षण होगा ||7||

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